प्रेरणा प्रसंग

अगर कोई मक्खी सब्जी तोलते हुए तराजू पर बैठ जाए तो ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन वही मक्खी अगर सोना तोलते  हुए तराजू पर बैठ जाए तो उसकी कीमत लगभग ₹10000 होगी हम कहां बैठते हैं ? हम किसके साथ बैठते हैं ? हमारा मूल्य उसी आधार पर निर्धारित किया जाता है  इस पोस्ट को पूरा पढ़ें 👇 












यह शब्द आपको भले ही कुछ आसान लगे पर इन शब्दों में बहुत बड़ा सत्य छुपा हुआ है 

चलो आपको एक उदाहरण से समझाते हैं     

एक बार एक मोहन नाम का व्यक्ति स्कूल से बच्चों की छुट्टी होने पर पास में ही एक मिठाई की दुकान पर जाता है और कहा सेठ जी दो किलो मिठाई अच्छे से पैक कर के दे दो  सेठ ने मिठाई को एक की जगह डबल डिब्बों में पैक करके दे दी फिर मोहन मिठाई के डिब्बे को सावधानीपूर्वक घर लाता है और घर के सभी सदस्यों को एक साथ बैठता है और मिठाई के डिब्बे को मेज के ऊपर रखता है तब सभी सदस्य दो-दो पीस मिठाई के लेते हैं फिर आखिर में डिब्बा खाली हो जाता है और उसे कचरे मैं फेंक देते हैं 

अतः इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिली की जब तक डिब्बों के अंदर मिठाई थी तब तक उस डिब्बे को बहुत ही सम्मान पूर्वक घर लाया और समान पूरक टेबल पर रखा जैसे ही मिठाई खत्म हुई तो उस डिब्बे को कचरे में डाल दिया गया ठीक उसी प्रकार इंसान भी एक डिब्बा ही है जब तक इंसान रूपी डिब्बे में गुण अच्छे कर्म होगे तब तक सभी समान करेंगे जैसे ही उसमें गुण खत्म हो जाते हैं तो उसे भी कचरे के समान माना जाता है जय हिंद। 

  मक्खी को खोल कर देखें  ▶️   








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